इसमें श्रीचक्र के बिंदु पीठ में माता महात्रिपुरसुंदरी यानि की श्री ललिता राजराजेश्वरी का ध्यान किया जाता है। विविध आवरणमें विविध देवियों का वास माना जाता है। उन देवियों का मूल मंत्र बोलकर पूजन होता है। हर आवरण पे विविध मुद्रा बताकर पूजन किया जाता है। नवम आवरण जो कि बिंदु है, जिसे सर्वआनंदमय चक्र कहा जाता है वह केंद्र का बिंदु है। यह परब्रह्मस्वरूपिणी महात्रिपुरसुंदरी ललिताम्बिका का स्थान है। इस स्थान पर पराशक्ति का परम पूजन होता है।
श्री यंत्र में नौ आवरण होते हैं, जिनके बाह्य और आंतरिक आवरण के विधि से क्रमिक पूजन किया जाता है। इसलिए श्रीमहात्रिपुरसुंदरी का सपर्या पूजन और श्रीचक्र (श्री यंत्र) आवरण पूजन को नववरण पूजा भी कहा जाता हैं। हर वरण पर विशिष्ट योगिनियों और देवियों का आह्वान कर गंध, पुष्प व मंत्रों से पूजन किया जाता है। यह श्रीविद्या साधना का सबसे पवित्र तांत्रिक अनुष्ठान माना जाता है। पूजन में उगते सूर्य के समान कांति वाली, पाश-अंकुश धारण करने वाली, तीन लोचन वाली माता श्री महात्रिपुरसुंदरी का ध्यान किया जाता है। यह पूजा बाहरी यंत्र से – हमारे आंतरिक सूक्ष्म शरीर के नौ आवरणों से होते हुए केंद्र बिंदु (बिंदु पीठ) में स्थित महाशक्ति की ओर ले जाने वाली एक आध्यात्मिक, प्रतीकात्मक यात्रा है।
SAPARYA PUJAN AVAM SHRI CHAKRA AVARANA PUJAN
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