मानस पूजामें किसी भी प्रकार की सामग्री के बिना सिर्फ मन के संकल्पों के द्वारा ही देवी को आसन, स्नान, वस्त्र, रत्न आभूषण और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। श्री त्रिपुरासुंदरी मानसपूजा स्तोत्रम की यह साधना आत्मबोध के लिए महत्त्व की मानी जाती है। ये स्तोत्र की साधना साधक के चित्त को शुद्ध कर के मानसिक शांति प्रदान करनेवाली है।
त्रिपुरासुंदरी मानसपूजा स्तोत्रम माँ भगवती श्री त्रिप्रसुंदरी की मानसिक पूजा से जुड़ा प्रसिद्ध स्तोत्र है। ये आदि शंकराचार्य द्वारा रचित स्तोत्र है जिसमें माँ त्रिपुरसुंदरी की मानसिक आराधना के श्लोक है। इस स्तोत्र के पहले श्लोक में कहा गया है, हे देवी आद्य शक्ति! मुझमें आपके चरणों में भजन करने की शक्ति नहीं है, न ही भक्ति है। मेरी आसक्ति ध्यानयोग में नहीं है और न ही मेरी विषयों से विरक्ति है। ऐसा विचार मनमें कर के मैं अपने वाणी रूपी पुष्पों से आपकी यह मानसिक पूजा -अर्चना करता हूँ।
MANAS PUJAN
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