दुसरे शतक में, १०१ से २०० तक, मार्तण्ड भैरव से शुरु होकर श्रीयंत्र के सब आवरणों, उसके देवी देवताओं की विस्तृत जानकारी हैं। उसमें ही श्री कामेश्वर और कामेश्वरी के ध्यान मंत्र है। तीसरे शतक में कवच वर्णित है। चूंकी यह प्राचीन स्रोत्र होने के कारण कई जगहों पर दीया गया वर्णन अर्वाचीन परंपराओं के पूजनों से उसके क्रमो से और रूपकों से थोड़ा अलग पाया जाता हैं। इस ग्रंथमे उसके आद्यात्मिक तत्त्व को व्यावहारिक दृष्टि – बुद्धि से आलेखित किया गया है, जो आदि देशिक महर्षि दुर्वासा के काव्य बहाव के साथ चलता हैं। इस पुस्तक में, वर्तमान के उपासकों की संस्कृत प्रवीणता की कक्षा को ध्यान में रखते हुए सरल भाषा में यह विनम्र संनिष्ठ शिक्षण प्रयास कीया हैं। विवरण दो समांतर संरचित अवधारणा से दिया है जो समजआवश्यक हैं। इस से उपासक अपनी आराध्य देवी के ईस पारायण का पूजन पठन करे सकते है। इसका नित्य पाठ साधक को नकारात्मकता से निकालकर अनिष्ट से सुरक्षा प्रदान करने वाला है। इसे नवरात्रि के दरमियान पारायण के स्वरूप में करने के अधिक फल बताए गए है।
महर्षि दुर्वासा प्रणीत श्री आर्या द्विशती श्रीविद्योपासना, उपासक के विकास की प्रक्रिया और श्री तत्व का सुंदर वर्णन करनेवाला नवप्रवर्तनकारी स्रोत हैं। श्री ललितास्तवरत्नम् पारायण क्रमः के प्रारंभिक भागमें ध्यान, ऋषि-न्यास, बीज, शक्तिः, कीलक एवं विनियोग के श्लोक सम्मिलित हैं। पहेले शतक में, श्लोक १ से १०० तक उपासक की श्री गणेशजी से मार्तंड भैरव तक उपासना की समज हैं। जो मंदिर ध्यान है, उसकी जगहों के महत्व को रूपकों से समझा जा सकता हैं।
SHREE AARYA DWISHATI STAVARATNARAJ
₹800.00 ₹720.00
Availability: 3 in stock












Reviews
There are no reviews yet.